बदलाव के नाम पर किसान की आंख में धूल झोंकने की कोशिश

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कृषि सुधारों के नाम पर लाए गए अध्यादेश न तो किसानों को सशक्त करेंगे और न ही उनकी आमदनी बढ़ा पाएंगे

राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन और अखिल भारतीय किसान संघर्ष कॉर्डिनेशन कमेटी के संयोजक के सरदार वीएम सिंह ने बताया की आजादी के बाद पिछले 70 साल से किसान घाटे का सौदा कर रहे हैं। एक तरफ उसकी जोत कम हो रही है, दूसरी तरफ उत्पादन की लागत बढ़ रही है। लेकिन उन्हें उपज बेचने पर लागत भी नसीब नहीं होती है। हर सरकार किसानों की पीड़ा का जिक्र चुनाव प्रचार में तो करती है, लेकिन जीतने के बाद पांच साल के लिए किसानों को भूल जाती हैं।

जहां कोरोना से देश परेशान है और लगभग 70 दिनों तक लॉकडाउन में रहा। उद्योगपति अपने घाटे के लिए सरकार से राहत मांगने लगे हैं। जब सरकार ने उद्योगपतियों के लिए राहत पैकेज तैयार किया होगा तो शायद उसे किसान के घाटे का अहसास रहा होगा, इसलिए सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज में बार-बार किसानों को राहत की बात की। यह अलग बात है कि किसान को इस पैकेज में राहत के नाम पर कुछ नहीं मिला।

सरकार को छोटे किसानों की पीड़ा देखनी चाहिए, जिनकी सब्जी, फल, दूध, फूल का नुकसान हुआ। सरकार ने मनरेगा को खेती के साथ जोड़ने या ग्रामीण क्षेत्र में खेती पर निर्धारित उद्योग लगाने की कोई बात नहीं की, लेकिन मंत्रिमंडल की सिफारिश पर राष्ट्रपति ने तीन फैसले लिए जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐतिहासिक बताया।

पहले फैसले के तहत आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 में संशोधन किया गया है, जिससे अनाज, दलहन, खाद्य तिलहन, खाद्य तेल, आलू और प्याज को आवश्यक वस्तुओं के दायरे से हटा दिया गया है। इसका मतलब अब अनाज, दलहन आदि वस्तुओं की जमाखोरी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाएगी।

एक अध्यादेश किसान की आमदनी बढ़ाने, उन्हें सशक्त और सुरक्षित करने के नाम पर लाया गया है। मोदी आत्मनिर्भर बनाने की बात करते हैं, तो वे कांट्रेक्ट फार्मिंग की वकालत करते दिखते हैं। कांट्रेक्ट फार्मिंग से उद्योगपति का फायदा होगा या किसान का? ऐसा नहीं कि हमने कांट्रेक्ट फार्मिग के बारे में पहली बार सुना है। 30 साल पहले पंजाब के किसानों ने पेप्सिको के साथ आलू और टमाटर उगाने के लिए समझौते किए और बर्बाद हो गए। वहीं, महाराष्ट्र के किसान कपास में बर्बाद हुए, जिससे आत्महत्याएं बढ़ीं।

इस अध्यादेश के तहत किसान को व्यापारी के साथ लिखित समझौता रजिस्टर करना होगा। यह किसके लिए बना है, यह धारा 2 (एफ) से अंदाज होता है। जहां फार्म प्रोड्यूसिंग ऑर्गनाइजेशन (एफपीओ) को किसान माना गया है, वहीं धारा 10 में किसान और व्यापारी के बीच विवाद में बिचौलिए (एग्रीगेटर) के रूप में भी रखा है। अगर एफपीओ किसान है तो एग्रीगेटर बनकर अपने खिलाफ फैसला कैसे करेगा?

धारा 3 (1) और 4 (1) में साफ है कि समझौते में फसल की गुणवत्ता, ग्रेडिंग और विशेष विवरण का हवाला दिया जाएगा, जिससे विवाद की गुंजाइश बनी रहेगी।

धारा 3 (3) में लिखा है कि समझौता एक फसल से पांच साल तक का होगा और आगे अनिश्चितकाल के लिए बढ़ाया जा सकता है।

धारा 5 के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग और सीधे ऑनलाइन खरीद का प्रावधान है और बाजार भाव यानी मंडी रेट या ऑनलाइन रेट की गारंटी की बात कही गई है।

इन फैसलों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) या स्वामीनाथम कमीशन के फॉर्मूले (सी2 के साथ 50 फीसदी मार्जिन) का जिक्र कहीं नहीं है। उपधारा 6 (2) में व्यापारी फसल तैयार होने से पहले फसल का मुआयना करेगा, जिससे किसान पर व्यापारी हावी रहेगा।

धारा 6 (4) के अनुसार, किसान को पैसा कब और कैसे दिया जाएगा, यह राज्य सरकार निर्धारित करेगी। आपसी विवाद सुलझाने के लिए 30 दिन के भीतर समझौता मंडल में जाना होगा। अगर वहां न सुलझा तो धारा 13 के अनुसार, एसडीएम के यहां मुकदमा करना होगा। एसडीएम के आदेश की अपील जिला अधिकारी के यहां होगी और जीतने पर किसान को भुगतान किए जाने का आदेश दिया जाएगा। इसकी वसूली के लिए जमीनी लगान की तरह की प्रक्रिया चलेगी।

देश के 85 फीसदी किसानों के पास दो-तीन एकड़ की ही जोत है। समझौता करने के बाद विवाद होने पर वे अपनी पूंजी तो वकीलों पर ही उड़ा देंगे। आज किसान अपनी फसल औने-पौने दाम पर बेचकर गुजारा तो कर लेता है। कल को अपना पैसा वसूल करने में वर्षों लग जाएंगे। देश के गन्ना किसानों को भी इन्हीं समझौतों के आधार पर प्रधानमंत्री के आश्वासन के बाद भी वर्षों तक पैसा नहीं मिलता है और आज वे पूरे देश के किसानों को इस मुसीबत में डालना चाहते हैं।

इस अध्यादेश के बाद तो किसानों का हाल गन्ना किसानों से भी बदतर होगा, क्योंकि गन्ना किसानों को भुगतान पिछले 25 वर्षों से देर-सवेर कोर्ट के जरिये मिल रहा है, यहां तो धारा 19 के अनुसार कोर्ट में जाने पर प्रतिबंध है। धारा 19 समझौते को लागू करने के लिए दीवानी अदालतों में जाने की रोक है। यह अध्यादेश कहीं से न तो किसान की आमदनी बढ़ाएगा, और न ही सशक्त और सुरक्षित करेगा।

दूसरा अध्यादेश फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन फैसेलिटेशन) ऑर्डिनेंस लाया गया है। अगर मोदी जी की मानें तो यह किसानों की जिंदगी बदल देगा क्योंकि अब एक राष्ट्र, एक बाजार के कारण किसानों को जहां ज्यादा पैसा मिलेगा, वहीं वह अपनी उपज बेचेगा।

किसान के पास न तो साधन है और न ही मौका कि वह अपनी फसल दूसरे मंडल या प्रांत में ले जाए। और गलती से अगर वह ले भी गया तो उसके बर्बादी के दिन शुरू हो जाएंगे क्योंकि धारा 4 में कहा गया है कि पैसा उस समय या तीन कार्य दिवस में दिया जाएगा। किसान का पैसा फंस गया तो उसे दूसरे मंडल या प्रांत में बार-बार चक्कर काटने होंगे।

धारा 13 और 15 में कहा गया है कि विवाद होने पर दीवानी अदालत में मुकदमा नहीं कर सकते हैं। न तो दो-तीन एकड़ जमीन वाले किसान के पास लड़ने की ताकत है और न ही वह इंटरनेट पर अपना सौदा कर सकता है। वह अपनी जमीन पर चारा, सब्जी और अनाज सब कुछ लगाता है। क्या वह उसे लेकर मुंबई, दिल्ली बेचने जाएगा? उसे शाम को अगले दिन की सब्जी भी तोड़नी होती है और क्या वह जाने-आने का खर्च बर्दाश्त करने की सोच भी पाएगा?

एक राष्ट्र, एक बाजार किसान के किसी काम का नहीं है। जबकि हमें चाहिए एक राष्ट्र, एक एमएसपी, जिससे किसान का भला हो सके। इतना कर दें कि एमएसपी से कम कोई सौदा न हो। एमएसपी से कम भाव पर खरीदने वाले को जेल जाना होगा।

लगता है सरकार को तो किसानों पर कानून टेस्टिंग कर तजुर्बा लेने की आदत पड़ गई है। याद है 2015 में भूमि अधिग्रहण, 2013 में संशोधन के लिए तीन बार अध्यादेश पाया गया जिसे किसान विरोध के कारण वापस लेना पड़ा। सरकार कानून बनाने से पहले उसका तजुर्बा अपने कृषि केंद्र, राज्य कृषि फार्म, अनुसंधान केंद्र एवं कृषि महाविद्यालयों में क्यों नहीं करती?

हकीकत है कि सरकार सुधारों के नाम पर किसानों की आंखों में धूल झोंक रही है। वास्तव में न तो 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज में और न ही इन अध्यादेशों में किसानों का कुछ भला होगा।


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